मुहब्बत में आपकी
मुनब्बत किया
मुलकत पर
मुलकित हुए थे
यह जान...
मल़हक़ थे उस वक्त
मुलम्मा किया मेरी
मुहब्बत को
मुलहिम थे
मुरब्बी थे खुद ही
मुशर्रफ किया था मुझे
मुबाशरत जान मुदित हुए थे तुम।
मुद्दत-दराज हुई यह वाक्या
मुब्तला-ए-बला हूं आज
मुरतकिब कहा जाता हूं
मसलन मुरतिद हो गया हूं
मुशाहरा की तरह भी अब
मुहब्बत नहीं आती
मुदम्मिग महमहा मुहतरमा की।
Sunday, 1 February 2009
बरसों बाद देखा...
तुम्हें बरसों बाद देखा
जैसे आज फिर पहली बार देखा
और ठगा रह गया
एक दूसरे का खूब-खूब स्पर्श करती
आतुर ऑखों ने कोसा आंधियों को
किसे समझाए, कितना कुछ उखड़ गया है
इस बीच...
एक भी ठहराव नहीं है दूर तक
जिसकी घनी छाव में जा बैठते हम
खूबसूरत शहर के बीच इसी वक्त
और किसी को पता भी नहीं लग पाता
ओ, मेरी हृदय... मेरी आत्मा!
यहां ज़ख्मों की तरह खुलती हैं
अर्जित गोपनीयताएं सबके सामने
कहां सहेजकर रखूं इन लम्हों को
जिनमें हम दो शापग्रस्त लहरों की तरह
खड़े हैं आमने-समने
और एक-दूसरे से न ही कर पाते हैं गुफ्तगू
न ही मिल पाती है गर्म सांसे
मुझे कभी यह भी लगता है
कि हम खड़े है बंजर तन्हाईयों के बीच
फर्ज कि राष्ट्रीय संग्रहालय में
अपने दिनों की संवेदनशील
मूर्तिशिल्पों की तरह
तुम्हें बरसों बाद देखा
अधजले झोपड़ियों के धुंए और
अधटूटे मकानों के दबी चीखों से निकलकर
एक जाति संहार के पर्व पर
यहां अचानक!
अपनी ही सड़कों पर
हम पर भी कसी फब्तियां
समय की टेढ़ी आंख ने
चुना हमें ही
शिकवा था मुझसे ही
कहा था उस वक्त
नज़र लगे न कहीं
उनके दस्त-ओ-बाजू को
यह लोग क्यों मिरे
ज़ख्म-ए-जिगर को
देखते हैं
नज़र में भर उसे
मेरे ज़ख्म भी मुस्कुराई थी
और तुम तो निकल परी थी
स्वर्ग के वस्त्र पहन कर
नई ठहराव की तलाश में
फिर तुम्हें पहली बार देखा
मंजिले-ए-तलाश में।
जैसे आज फिर पहली बार देखा
और ठगा रह गया
एक दूसरे का खूब-खूब स्पर्श करती
आतुर ऑखों ने कोसा आंधियों को
किसे समझाए, कितना कुछ उखड़ गया है
इस बीच...
एक भी ठहराव नहीं है दूर तक
जिसकी घनी छाव में जा बैठते हम
खूबसूरत शहर के बीच इसी वक्त
और किसी को पता भी नहीं लग पाता
ओ, मेरी हृदय... मेरी आत्मा!
यहां ज़ख्मों की तरह खुलती हैं
अर्जित गोपनीयताएं सबके सामने
कहां सहेजकर रखूं इन लम्हों को
जिनमें हम दो शापग्रस्त लहरों की तरह
खड़े हैं आमने-समने
और एक-दूसरे से न ही कर पाते हैं गुफ्तगू
न ही मिल पाती है गर्म सांसे
मुझे कभी यह भी लगता है
कि हम खड़े है बंजर तन्हाईयों के बीच
फर्ज कि राष्ट्रीय संग्रहालय में
अपने दिनों की संवेदनशील
मूर्तिशिल्पों की तरह
तुम्हें बरसों बाद देखा
अधजले झोपड़ियों के धुंए और
अधटूटे मकानों के दबी चीखों से निकलकर
एक जाति संहार के पर्व पर
यहां अचानक!
अपनी ही सड़कों पर
हम पर भी कसी फब्तियां
समय की टेढ़ी आंख ने
चुना हमें ही
शिकवा था मुझसे ही
कहा था उस वक्त
नज़र लगे न कहीं
उनके दस्त-ओ-बाजू को
यह लोग क्यों मिरे
ज़ख्म-ए-जिगर को
देखते हैं
नज़र में भर उसे
मेरे ज़ख्म भी मुस्कुराई थी
और तुम तो निकल परी थी
स्वर्ग के वस्त्र पहन कर
नई ठहराव की तलाश में
फिर तुम्हें पहली बार देखा
मंजिले-ए-तलाश में।
अच्छा है कि चल पड़ो...
जमीन के मुद्दे पर ग्वालिर से दिल्ली तक 25000 आदिवासी एकजुट होकर करीब 350 किमी. की जनादेश पदयात्रा 2007, के दौरान पदयात्रा के नायक पी. वी. राजगोपाल से आगरा में हुई बातचीत का कुछ अंश –
जमीन के सवाल पर सरकार की भूमिका क्या रही है?
यही है कि आजादी मिलने के दौरान सभी भमिहीनों को भूस्वीमी बनाने की बात की जा रही थी और आज साठ साल बाद बचे-खुचे छोटे भूस्वामियों को भी भूमिहीन बनाने की कार्रवाई की जा रही है। यानी साठ साल में एकदम उलटा हो गया है। अपने देश के संविधान में भी भूमिहीनों को जमीन देने की बात कही गई है, पर अब इस पर कोई बात नही करता। राजनीतिक पार्टियां भी पहले अपने घोषणापत्र में भूमिहीनों को जमीन दिलाने का वादा करती थीं। अब वे भी इससे मुकर रही है। सरकार और राजनीतिक पार्टियों की प्राथमिकताएं बदल गई है।
जमीन को लेकर सरकार और राजनीतिक पार्टियों का रवैया बदलने का क्या नतीजा सामने आया है?
यही कि आज देश के डेढ़ सौ से अधिक जिले नक्सली हिंसा की चपेट में आ गए हैं। सरकार अगर बहुत दिनों तक वंचितों को नजरअंदाज करती रहेगी तो वे या तो आत्महत्या करेंगे या दूसरों की हत्या करेंगे। हम सरकार से लगातार कह रहे कि वह पूरी निष्ठा के साथ वंचितों की समस्या के समाधान के लिए आगे आए। समाज को हिंसा की ओर न धकेले। हिंसा से मुक्ति का रास्ता हमें गांधी ने दिखाया है। हम उनके कहे पर विनम्रता से अमल करने की कोशिश कर रहे हैं। गांधी ने भी चेतावनी दी थी कि अगर विषमता लगातार बढ़ती जाएगी तो अहिंसा को बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा। जब तक विषमता मिटाने के लिए पहल नहीं की जाएगी तब तक गांधी जयंती को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाने का कोई मतलब नहीं होगा।
फिर ऐसे में आपका क्या प्रयास चल रही है?
पिछले तीन सालों में सत्ता में शामिल नेताओं-मंत्रियों से बात कर रहे हैं। विपक्षी नेताओं से भी बात कर रहे हैं। भूमिहीनों को जमीन देने के सवाल पर सभी सैद्धांतिक रूप से सहमत हो जाते हैं, लेकिन सिर्फ सैद्धांतिक सहमति से गरीबों का भला नहीं होगा। हम आश्वासन मात्र से खुश नहीं होने वाले, हम तत्काल कार्रवाई चाहते हैं। राष्ट्रीय विमुक्त घुमंतू जनजाति आयोग के अध्यक्ष बालकृष्ण रेंके ने न्यूनतम लैंड होल्डिंग की सिफारिश की है। यानी हरेक के पास कुछ न कुछ जमीन होनी चाहिए, लेकिन यह भी तय होना चाहिए कि हरेक के पास कितनी जमीन हो। हम सरकार के सामने इस बात को भी रखते आ रहे हैं।
जनादेश पदयात्रा की तैयारी आपने कैसे की?
यह एक ऐतिहासिक घटना है। हम कई वर्षों से युवाओं को तैयार कर रहे थे समाज की दुर्व्यवस्था को सुधारने के लिए। दुर्व्यवस्था सुधारने का मतलब है कि गांव-गांव में जाओ और वंचित जनता की मदद करे। उनके अधिकारों के लिए लड़ो। ऐसे काम करते-करते देश भर में जो फैलाव हुआ, उसी आधार पर युवा लोग तैयार हुए और गांव-गांव में संगठन बने। यह मेरी तीस वर्षों की तैयारी है। इस पदयात्रा में शामिल ज्यादातर लोग वही हैं, जो पहले की कई पदयात्राओं में शामिल हुए हैं। हम जनादेश पदयात्रा के पहले कई छोटी-बड़ी पदयात्राओं के लिए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश करते रहे हैं, ताकि वे वंचितों के हक में काम करें। अब स्थिति यह हो गई है कि वंचितों के हित में काम करना क्रांतिकारियों का काम नहीं रह गया है, केंद्र सरकार भी इस काम से बच रही है।
पिछले दिनों सरकार ने जो नीतियां बनाई हैं उससे वंचित और भी वंचित होते जा रहे हैं। जिनके पास थोड़ी बहुत जमीन थी वह भूमि अधिग्रहण में चली गई। जिनके पास थोड़ा बहुत जीने का साधने था, वह जंगल अधिग्रहण में चला गया। बहुतों की जमीन वन्यप्राणियों के अभयारण्य में चली गई। इस तरह लोग उजड़ते गए और एकता परिषद का संगठन मजबूत होता चला गया।
जनादेश पदयात्री कितने उत्साहित हैं?
बहुत उत्साहित हैं। वे इतने दिनों से जो पीड़ा सह रहे हैं, उसे अब वयक्त करना चाहते हैं कि अब बहुत हो गया, इससे ज्यादा हम सहन नहीं करेंगे। अब वे नंगे पैर गर्म सड़क पर भी चलने के लिए तैयार हैं। चलते हुए कईयों के पैरों में फफोले पड़ गए। पदयात्रा में बहुत से ऐसे वंचित भी शामिल हैं जिनके पास पर्याप्त कपड़े नहीं हैं। सर्दी इतनी पड़ी कि लोग रात में ठिठुरते रहे पर वे दिल्ली तक यात्रा में शामिल रहे। उन पदयात्रियों के साथ इतने धोखे हुए हैं कि वे यह सब सहने के लिए तैयार है, उन्हें लगता है कि बैठे रहने से कोई नेता आकर उनकी समस्या का समाधान नहीं कर देगा। तब उन्होंने निर्णय लिया कि नेताओं के इंतजार में बैठ कर वक्त बर्बाद नहीं करना है। इससे अच्छा है कि चल पड़ो। हम चल पड़े हैं। अब जिनको बात करनी है वे आएं हमारे पास। हम नेताओं-मंत्रियों के इंतजार में नहीं बैठे रहेंगे।
पदयात्रा शुरू होने के बाद समाज के लोगों से कैसी मदद मिल रही है?
जबरदस्त मदद मिली है। ग्वालियर से जब यात्रा निकली तो पहले पड़ाव पर एक ही व्यक्ति ने पचीस हजार लोगों को खाना खिला दिया। और जगह-जगह, गांव और शहर के लोगों पदयात्रियों पर फूल बरसा रहे हैं। मालाओं की तो बौछार है। बच्चे एक-एक किलोमीटर तक लाइन लगा कर एक-एक रुपया मदद देने के लिए तैयार हुए। गांव में किसान पदयात्रियों को पानी पिलाने के लिए होड़ कर रहे थे कि हम देंगे कि हम देंगे। हर पड़ाव पर लोग बिस्कुट, चावल, दाल, कंबल, चप्पल लेकर आ रहे थे।
यह सब देख कर अंदाज नहीं लगता कि लोग किस हद तक हमलोगों की मदद करना चाहते हैं। चंबल की भूमि हो या ब्रज का क्षेत्र हो, हर जगह लोगों में हमारी मदद करने का उत्साह देखने को मिला। कहा जाए कि मदद का उत्साह व्यापक है। लोग दल से ऊपर उठ कर आ रहे हैं- चाहे वे कांग्रेस के हों या भापजा या अन्य पार्टी के।
यह साक्षात्कार 28 अक्टूबर, 2007 को जनसत्ता ‘रविवारी’ में प्रकाशित हुई है।
जमीन के सवाल पर सरकार की भूमिका क्या रही है?
यही है कि आजादी मिलने के दौरान सभी भमिहीनों को भूस्वीमी बनाने की बात की जा रही थी और आज साठ साल बाद बचे-खुचे छोटे भूस्वामियों को भी भूमिहीन बनाने की कार्रवाई की जा रही है। यानी साठ साल में एकदम उलटा हो गया है। अपने देश के संविधान में भी भूमिहीनों को जमीन देने की बात कही गई है, पर अब इस पर कोई बात नही करता। राजनीतिक पार्टियां भी पहले अपने घोषणापत्र में भूमिहीनों को जमीन दिलाने का वादा करती थीं। अब वे भी इससे मुकर रही है। सरकार और राजनीतिक पार्टियों की प्राथमिकताएं बदल गई है।
जमीन को लेकर सरकार और राजनीतिक पार्टियों का रवैया बदलने का क्या नतीजा सामने आया है?
यही कि आज देश के डेढ़ सौ से अधिक जिले नक्सली हिंसा की चपेट में आ गए हैं। सरकार अगर बहुत दिनों तक वंचितों को नजरअंदाज करती रहेगी तो वे या तो आत्महत्या करेंगे या दूसरों की हत्या करेंगे। हम सरकार से लगातार कह रहे कि वह पूरी निष्ठा के साथ वंचितों की समस्या के समाधान के लिए आगे आए। समाज को हिंसा की ओर न धकेले। हिंसा से मुक्ति का रास्ता हमें गांधी ने दिखाया है। हम उनके कहे पर विनम्रता से अमल करने की कोशिश कर रहे हैं। गांधी ने भी चेतावनी दी थी कि अगर विषमता लगातार बढ़ती जाएगी तो अहिंसा को बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा। जब तक विषमता मिटाने के लिए पहल नहीं की जाएगी तब तक गांधी जयंती को विश्व अहिंसा दिवस के रूप में मनाने का कोई मतलब नहीं होगा।
फिर ऐसे में आपका क्या प्रयास चल रही है?
पिछले तीन सालों में सत्ता में शामिल नेताओं-मंत्रियों से बात कर रहे हैं। विपक्षी नेताओं से भी बात कर रहे हैं। भूमिहीनों को जमीन देने के सवाल पर सभी सैद्धांतिक रूप से सहमत हो जाते हैं, लेकिन सिर्फ सैद्धांतिक सहमति से गरीबों का भला नहीं होगा। हम आश्वासन मात्र से खुश नहीं होने वाले, हम तत्काल कार्रवाई चाहते हैं। राष्ट्रीय विमुक्त घुमंतू जनजाति आयोग के अध्यक्ष बालकृष्ण रेंके ने न्यूनतम लैंड होल्डिंग की सिफारिश की है। यानी हरेक के पास कुछ न कुछ जमीन होनी चाहिए, लेकिन यह भी तय होना चाहिए कि हरेक के पास कितनी जमीन हो। हम सरकार के सामने इस बात को भी रखते आ रहे हैं।
जनादेश पदयात्रा की तैयारी आपने कैसे की?
यह एक ऐतिहासिक घटना है। हम कई वर्षों से युवाओं को तैयार कर रहे थे समाज की दुर्व्यवस्था को सुधारने के लिए। दुर्व्यवस्था सुधारने का मतलब है कि गांव-गांव में जाओ और वंचित जनता की मदद करे। उनके अधिकारों के लिए लड़ो। ऐसे काम करते-करते देश भर में जो फैलाव हुआ, उसी आधार पर युवा लोग तैयार हुए और गांव-गांव में संगठन बने। यह मेरी तीस वर्षों की तैयारी है। इस पदयात्रा में शामिल ज्यादातर लोग वही हैं, जो पहले की कई पदयात्राओं में शामिल हुए हैं। हम जनादेश पदयात्रा के पहले कई छोटी-बड़ी पदयात्राओं के लिए सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश करते रहे हैं, ताकि वे वंचितों के हक में काम करें। अब स्थिति यह हो गई है कि वंचितों के हित में काम करना क्रांतिकारियों का काम नहीं रह गया है, केंद्र सरकार भी इस काम से बच रही है।
पिछले दिनों सरकार ने जो नीतियां बनाई हैं उससे वंचित और भी वंचित होते जा रहे हैं। जिनके पास थोड़ी बहुत जमीन थी वह भूमि अधिग्रहण में चली गई। जिनके पास थोड़ा बहुत जीने का साधने था, वह जंगल अधिग्रहण में चला गया। बहुतों की जमीन वन्यप्राणियों के अभयारण्य में चली गई। इस तरह लोग उजड़ते गए और एकता परिषद का संगठन मजबूत होता चला गया।
जनादेश पदयात्री कितने उत्साहित हैं?
बहुत उत्साहित हैं। वे इतने दिनों से जो पीड़ा सह रहे हैं, उसे अब वयक्त करना चाहते हैं कि अब बहुत हो गया, इससे ज्यादा हम सहन नहीं करेंगे। अब वे नंगे पैर गर्म सड़क पर भी चलने के लिए तैयार हैं। चलते हुए कईयों के पैरों में फफोले पड़ गए। पदयात्रा में बहुत से ऐसे वंचित भी शामिल हैं जिनके पास पर्याप्त कपड़े नहीं हैं। सर्दी इतनी पड़ी कि लोग रात में ठिठुरते रहे पर वे दिल्ली तक यात्रा में शामिल रहे। उन पदयात्रियों के साथ इतने धोखे हुए हैं कि वे यह सब सहने के लिए तैयार है, उन्हें लगता है कि बैठे रहने से कोई नेता आकर उनकी समस्या का समाधान नहीं कर देगा। तब उन्होंने निर्णय लिया कि नेताओं के इंतजार में बैठ कर वक्त बर्बाद नहीं करना है। इससे अच्छा है कि चल पड़ो। हम चल पड़े हैं। अब जिनको बात करनी है वे आएं हमारे पास। हम नेताओं-मंत्रियों के इंतजार में नहीं बैठे रहेंगे।
पदयात्रा शुरू होने के बाद समाज के लोगों से कैसी मदद मिल रही है?
जबरदस्त मदद मिली है। ग्वालियर से जब यात्रा निकली तो पहले पड़ाव पर एक ही व्यक्ति ने पचीस हजार लोगों को खाना खिला दिया। और जगह-जगह, गांव और शहर के लोगों पदयात्रियों पर फूल बरसा रहे हैं। मालाओं की तो बौछार है। बच्चे एक-एक किलोमीटर तक लाइन लगा कर एक-एक रुपया मदद देने के लिए तैयार हुए। गांव में किसान पदयात्रियों को पानी पिलाने के लिए होड़ कर रहे थे कि हम देंगे कि हम देंगे। हर पड़ाव पर लोग बिस्कुट, चावल, दाल, कंबल, चप्पल लेकर आ रहे थे।
यह सब देख कर अंदाज नहीं लगता कि लोग किस हद तक हमलोगों की मदद करना चाहते हैं। चंबल की भूमि हो या ब्रज का क्षेत्र हो, हर जगह लोगों में हमारी मदद करने का उत्साह देखने को मिला। कहा जाए कि मदद का उत्साह व्यापक है। लोग दल से ऊपर उठ कर आ रहे हैं- चाहे वे कांग्रेस के हों या भापजा या अन्य पार्टी के।
यह साक्षात्कार 28 अक्टूबर, 2007 को जनसत्ता ‘रविवारी’ में प्रकाशित हुई है।
Friday, 30 January 2009
प्यार किया नहीं जाता… हो जाता है!
साइंस ऑफ लव
ऐसा क्या होता है जब एक लम्हें में भूख खत्म हो जाती है, चैन चला जाता है, दिल कहीं लगता नहीं, दिमाग कुछ और सोचता नहीं। क्या कोई गंध होती है जिसे वयक्ति पहचान लेता है या कोई तरंग होती है जो अचानक आपको किसी का दोस्त बना देती है? चाहत ऐसी जो किसी हद तक जाने को मजबूर कर देती है। विज्ञान को इस बात की शरू से ही तलाश रही है कि वह क्या चीज है जो व्यक्ति को हर कुछ कर गुजरने पर मजबूर कर देती है। किसी की खातिर मर-मिटने और सारी परंपराएं-मर्यादाएं तोड़ने को बाध्य कर देती है। आखिर वे क्या कारण है? लोग पीड़ा, जुदाई और बदनामी के बाद भी इश्क की धुन में गुम रहते हैं। इक नज़र में दीवाना बन जाते हैं। यहां तक कि प्रेम के शोध में जुटे वैज्ञानिक भी इसे सही मानते हैं कि प्रेम किसी से भी कहीं भी, कभी भी हो सकता है। ‘द बॉयलॉजी ऑफ लव’ किताब के लेखक डा. जेनव कहते हैं कि मनुष्य एक विचारशील जीव से पहले एक संवेदनशील जीव है, इसलिए प्रेम जैसी भावना की कमी से व्यक्ति के विकास और जीने की क्षमता भी प्रभावित होती है। उदाहरणस्वरूप जिन बच्चों को बचपन से ही प्यार कम मिलता है उसका दिमाग सामान्य बच्चों से अलग होता है। उनमें तनाव से जुड़े हार्मोन अधिक पाए जाते हैं। इसलिए ऐसे बच्चे अधिक दुःखी रहते हैं। धीरे-धीरे वे आपराधिक प्रवृति की ओर अग्रसर होने लगते हैं। वहीं कुछ लोग प्रेम को जीवन का अमूल्य वरदान मानते हैं और यहां तक कह बैठते हैं कि प्रेम बिन सारा जग सूना। प्रेम के गुत्थी को सुलझाते हुए वैज्ञानिकों ने दिमाग के उस भाग का पता लगाया जो रूमानी प्रेम में सक्रिय होता है। उन्होंने एक दिलचस्प बात बताई कि दिमाग का वह हिस्सा जो प्रेम के समय सक्रिय होता है। वह दिमाग के उस भाग से बिल्कुल अलग होता है जो अक्सर भावनात्मक स्थितियों जैसे गुस्से या आनंद के समय सक्रिय होता है। दरअसल प्यार में दिमाग का वह विशेष हिस्सा सक्रिय होता है, जो नशा सेवन के दौरान अजीब-सी अनुभूति का एहसास कराता है। वह प्यार में किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है। जब किसी को प्यार होता है तो उसके दिमाग में कुछ अलग ही चल रहा होता है और वह सामान्य से कुछ अलग हो जाता है यानी पूरी तरह दीवाना। आमतौर पर प्यार के तीन रूप है... पहला वासना, दूसरा चाहत, तीसरा आसक्ति। वासना और चाहत तो समय के साथ खत्म हो जाते हैं लेकिन यही चाहत आसक्ति में बदल जाए तो फिर यह बंधन जिंदगी भर का हो जाता है। प्यार की एक कहावत माने तो कहा जाता है कि प्यार अंधा होता है। प्यार में पड़े व्यक्ति को अपने सामने वाले व्यक्ति में कोई भी कमी नहीं महसूस होता है।
फैरिस स्टेट यूनिवर्सिटी, मिशिगन के वैज्ञानिक रॉबर्ट फ्रेयर के अनुसार प्यार के पीछे मानव शरीर में उपस्थिति न्यूरोकैमिकल का हाथ होता है और यह न्यूरोकैमिकल फिनाइल इथाइल अमीन है। यह कैमिकल अपने प्रेमी या प्रेमिका की खामियों को नजरअंदाज कर प्रेम में डूबी खुशियों का अहसास कराता है। ऐसे वक्त प्रेमी या प्रेमिका की छोटी-छोटी बातें भी दिल को दीवाना कर देती हैं। यहां तक कि अगर प्रेमी या प्रेमिका झूठ भी बोले तो भी यकीन नहीं होता।
मनोवैज्ञानिक का माने तो प्यार में भावनाओं और संवेदनाओं के साथ कुछ और चीजों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वह है आंख। ‘नैन मटकबे तो जिया जलबे करी’ गीत प्रेम में आंख की महत्ता की एक रोमांचक मोड़ पर खड़ी कर देती है। प्यार आंख से शूरू होकर जीवन भर का बंधन बन जाता है। आंखों का प्यार आखिर जीवन भर का बंधन कैसे बन जाता है? शोध वैज्ञानिक कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति का आंखों का जादू नब्बे सेकेंड से चार मिनट में चल जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति के भावनाओं और इच्छाओं का आकलन कर लेता है। धीरे-धीरे दिल में उस व्यक्ति के लिए जगह में बन जाती है। प्यार का इजहार करने में सांसों की खुशबू का योगदान कम नहीं है। हर व्यक्ति में एक गंध पाई जाती है जो नाक के जरिए दिमाग तक पहुंचती है। दिमाग इस गंध को डीकोड करता है और उस विशेष व्यक्ति के जींस के बारे में पता करता है। इन जींस की बनावट को जानकर हमारा मस्तिक यह तय करता है कि वह व्यक्ति हमारा साथी बनने लायक है या नहीं। लिहाजा यदि आप सच्चे साथी की खोज में हैं तो अपनी के साथ-साथ नाक पर भी भरोसा कर सही निर्णय तक पहुंच सकते हैं। किसी भी व्यक्ति के प्रति आकर्षण का जादू चलते वक्त पचपन फीसद योगदान हावभाव, अड़तीस फीसद बातचीत, सात फीसद ज्ञानलुक और भाषा की होती है।
प्रो. आर्थर कहते हैं कि प्रेम में आपका आकर्षण होना बहुत महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि सौम्यता और बुद्धि। जाहिर है कि प्रेम सिर्फ प्रेम है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। इसे किसी रिश्ते में नहीं बांधा जा सकता है। यह हमारे भीतर से आता है। मालूम नहीं होता... जाने कैसे, कब, कहां, इकरार हो जाता है, हम सोचते ही रह जाते हैं और प्यार हो जाता है।
ऐसा क्या होता है जब एक लम्हें में भूख खत्म हो जाती है, चैन चला जाता है, दिल कहीं लगता नहीं, दिमाग कुछ और सोचता नहीं। क्या कोई गंध होती है जिसे वयक्ति पहचान लेता है या कोई तरंग होती है जो अचानक आपको किसी का दोस्त बना देती है? चाहत ऐसी जो किसी हद तक जाने को मजबूर कर देती है। विज्ञान को इस बात की शरू से ही तलाश रही है कि वह क्या चीज है जो व्यक्ति को हर कुछ कर गुजरने पर मजबूर कर देती है। किसी की खातिर मर-मिटने और सारी परंपराएं-मर्यादाएं तोड़ने को बाध्य कर देती है। आखिर वे क्या कारण है? लोग पीड़ा, जुदाई और बदनामी के बाद भी इश्क की धुन में गुम रहते हैं। इक नज़र में दीवाना बन जाते हैं। यहां तक कि प्रेम के शोध में जुटे वैज्ञानिक भी इसे सही मानते हैं कि प्रेम किसी से भी कहीं भी, कभी भी हो सकता है। ‘द बॉयलॉजी ऑफ लव’ किताब के लेखक डा. जेनव कहते हैं कि मनुष्य एक विचारशील जीव से पहले एक संवेदनशील जीव है, इसलिए प्रेम जैसी भावना की कमी से व्यक्ति के विकास और जीने की क्षमता भी प्रभावित होती है। उदाहरणस्वरूप जिन बच्चों को बचपन से ही प्यार कम मिलता है उसका दिमाग सामान्य बच्चों से अलग होता है। उनमें तनाव से जुड़े हार्मोन अधिक पाए जाते हैं। इसलिए ऐसे बच्चे अधिक दुःखी रहते हैं। धीरे-धीरे वे आपराधिक प्रवृति की ओर अग्रसर होने लगते हैं। वहीं कुछ लोग प्रेम को जीवन का अमूल्य वरदान मानते हैं और यहां तक कह बैठते हैं कि प्रेम बिन सारा जग सूना। प्रेम के गुत्थी को सुलझाते हुए वैज्ञानिकों ने दिमाग के उस भाग का पता लगाया जो रूमानी प्रेम में सक्रिय होता है। उन्होंने एक दिलचस्प बात बताई कि दिमाग का वह हिस्सा जो प्रेम के समय सक्रिय होता है। वह दिमाग के उस भाग से बिल्कुल अलग होता है जो अक्सर भावनात्मक स्थितियों जैसे गुस्से या आनंद के समय सक्रिय होता है। दरअसल प्यार में दिमाग का वह विशेष हिस्सा सक्रिय होता है, जो नशा सेवन के दौरान अजीब-सी अनुभूति का एहसास कराता है। वह प्यार में किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है। जब किसी को प्यार होता है तो उसके दिमाग में कुछ अलग ही चल रहा होता है और वह सामान्य से कुछ अलग हो जाता है यानी पूरी तरह दीवाना। आमतौर पर प्यार के तीन रूप है... पहला वासना, दूसरा चाहत, तीसरा आसक्ति। वासना और चाहत तो समय के साथ खत्म हो जाते हैं लेकिन यही चाहत आसक्ति में बदल जाए तो फिर यह बंधन जिंदगी भर का हो जाता है। प्यार की एक कहावत माने तो कहा जाता है कि प्यार अंधा होता है। प्यार में पड़े व्यक्ति को अपने सामने वाले व्यक्ति में कोई भी कमी नहीं महसूस होता है।
फैरिस स्टेट यूनिवर्सिटी, मिशिगन के वैज्ञानिक रॉबर्ट फ्रेयर के अनुसार प्यार के पीछे मानव शरीर में उपस्थिति न्यूरोकैमिकल का हाथ होता है और यह न्यूरोकैमिकल फिनाइल इथाइल अमीन है। यह कैमिकल अपने प्रेमी या प्रेमिका की खामियों को नजरअंदाज कर प्रेम में डूबी खुशियों का अहसास कराता है। ऐसे वक्त प्रेमी या प्रेमिका की छोटी-छोटी बातें भी दिल को दीवाना कर देती हैं। यहां तक कि अगर प्रेमी या प्रेमिका झूठ भी बोले तो भी यकीन नहीं होता।
मनोवैज्ञानिक का माने तो प्यार में भावनाओं और संवेदनाओं के साथ कुछ और चीजों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वह है आंख। ‘नैन मटकबे तो जिया जलबे करी’ गीत प्रेम में आंख की महत्ता की एक रोमांचक मोड़ पर खड़ी कर देती है। प्यार आंख से शूरू होकर जीवन भर का बंधन बन जाता है। आंखों का प्यार आखिर जीवन भर का बंधन कैसे बन जाता है? शोध वैज्ञानिक कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति का आंखों का जादू नब्बे सेकेंड से चार मिनट में चल जाता है। इस अवस्था में व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति के भावनाओं और इच्छाओं का आकलन कर लेता है। धीरे-धीरे दिल में उस व्यक्ति के लिए जगह में बन जाती है। प्यार का इजहार करने में सांसों की खुशबू का योगदान कम नहीं है। हर व्यक्ति में एक गंध पाई जाती है जो नाक के जरिए दिमाग तक पहुंचती है। दिमाग इस गंध को डीकोड करता है और उस विशेष व्यक्ति के जींस के बारे में पता करता है। इन जींस की बनावट को जानकर हमारा मस्तिक यह तय करता है कि वह व्यक्ति हमारा साथी बनने लायक है या नहीं। लिहाजा यदि आप सच्चे साथी की खोज में हैं तो अपनी के साथ-साथ नाक पर भी भरोसा कर सही निर्णय तक पहुंच सकते हैं। किसी भी व्यक्ति के प्रति आकर्षण का जादू चलते वक्त पचपन फीसद योगदान हावभाव, अड़तीस फीसद बातचीत, सात फीसद ज्ञानलुक और भाषा की होती है।
प्रो. आर्थर कहते हैं कि प्रेम में आपका आकर्षण होना बहुत महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि सौम्यता और बुद्धि। जाहिर है कि प्रेम सिर्फ प्रेम है, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है। इसे किसी रिश्ते में नहीं बांधा जा सकता है। यह हमारे भीतर से आता है। मालूम नहीं होता... जाने कैसे, कब, कहां, इकरार हो जाता है, हम सोचते ही रह जाते हैं और प्यार हो जाता है।
Friday, 23 January 2009
पहचान पत्र
“दिल्ली को हर तरफ से छू कर देखना चाहता हूं, मगर मेरे पास कोई पहचान पत्र नहीं है जिससे मेरी पहचान हो सके कि मैं इस देश का एक छोटे-से गांव का लड़का हूं।” इतना कहते ही बीस साल के जाकिर हुसैन का चेहरा अचानक किसी भय को भॉपकर सावधान हो जाता है और सहमे नज़र से इधर-उधर देखने लगता है। कुछ देर बाद सहज होकर जाकिर कहता है, ‘पिछले दो महीने पहले दिल्ली में आया था बड़ा अधिकारी बनने के लिए यूपीएससी की तैयारी करने। लेकिन यहां देखा कि मुंबई में चरमपंथियों के हमले के मद्देनज़र अवैधरूप से रह रहे पाकिस्तानी और बंग्लादेशी खासकर मुस्लिम नागरिकों की जाँच-पड़ताल चल रही है। तो इस डर से कि बाहर निकलने पर पुलिसिया पूछताछ में घबड़ा जाने पर पकड़ लिया जाऊं। इस कारण अपने गांव के छः दोस्तों के साथ उनके एक कमरे में रह रहा हूं। फिर एक परिचित के सहारे एक मैगजिन में ऑफिस सहायक के रूप में काम पर लग गया हूं। मैगजीन के संपादक जी ने कहा है कि मैगजीन का एक पहचान पत्र बना दूंगा। उसके बाद मैं दिल्ली को देखने जाऊंगा। तबतक इंतजार करूंगा।’
जाकिर और जाकिर जैसे देश के कई लोगों के पास किसी तरह का पहचान पत्र न रहना इत्तिफाक ही होता है। क्योंकि जब उसके इलाके में पहचान पत्र बनाई जाती है तब वह दूसरे नगरों में रोजगार कर रहा होता है। अगर अपने इलाके में रहता भी है तो उसके नाम पहचान पत्र बनाने वाले के सूची में नहीं होता है।
इस तरह सैंकड़ों जाकिर इस जमीन पर अस्तित्व में आने के बावजूद अपनी पहचान पत्र न होने या बनने के इंतजार में इस बड़ी सी खूबसूरत दुनिया के छोटे से कोने में खुद को सिकोड़ कर बैठा रहता है।
दूसरी तरफ अनगिनत ऐसे दहशतगढ़ हैं जो भारतीय पहचान पत्र बनाकर हमारे देश के कई इलाकों में आतंक का ताण्डव कर रहा है। इसी का नजारा है हाल में दिल्ली में पकड़ा गया पाकिस्तानी नागरिक आफताब उर्फ अलीखान। जो दिल्ली विधान सभा चुनाव में सीमापुरी क्षेत्र में कांग्रेसी उम्मीदवार के लिए पोलिंग एजेण्ट के तौर पर काम कर रहा था। गौरतलब है कि वह पिछले तीन साल से हमारे देश में रह रहा है और दिल्ली चुनाव में मतदान भी किया है। उसके पास से दिल्ली राज्य के कांग्रेस विधायक वीर सिंह धिंगान का कार्यकर्ता पहचान पत्र, देहरादून का ड्राईविंग लाईसेंस, स्वयं सहायता समूह का परिचय पत्र, पाकिस्तानी पासपोर्ट का फोटो कॉपी पाई गई। साथ ही दिल्ली के वोटर लिस्ट में अफताब का नाम भी है।
अब सवाल यह रह जाता है कि इन सबका जिम्मेदार कौन है? कहां हुई है चूक?
इसके जवाब के लिए हम जनता और सरकार को ईमानदारी से अपने अंदर झांकने का समय सामने आ गया है।
चूंकि आतंकवाद पर देश के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में राजस्थान के मुख्यमंत्री ने आतंकवाद से निपटने के लिए पूरे देश में फोटो पहचान पत्र बनाने की बात कही है। इसलिए फोटो पहचान पत्र बनाने की प्रक्रिया पर भी नज़र डालना होगा। जिसे बिल्कुल पाक-साफ नहीं कहा जा सकता। फोटो पहचान पत्र बनाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट ब्लॉक के अधिकारियों को मतदाता सूची बनाने का निर्देश जारी करता है जिसे ब्लॉक के अधिकारी ग्राम पंचायत या सरकारी विद्यालय के शिक्षकों को गांव-मुहल्लों में जाकर नागरिकों की सूची तैयार करने के लिए कहता है। लेकिन पंचायत और शिक्षक घर-घर न जाकर वे क्षेत्र के राजनीतिक कार्यकर्ता या दबंग लोगों से मशविरा कर मतदाता सूची तैयार कर लेता है। ये राजनैतिक कार्यकर्ता अपने पार्टी के ज्यादा से ज्यादा सदस्य और वोटर बनाने के लोभ में पसंद के लोग और रिश्तेदारों को एक से अधिक बार नाम बदल कर सूची तैयार करवाता है। फोटो खिंचवाते समय आसपास के पहचान के लोगों का बारी-बारी से सूची में नामानुसार फोटो बनवाया जाता है। कई इलाकों में जाति और धर्म विशेष के लोग निम्न वर्ग के लोगों को दबाकर उनके नाम पर अपने लोगों का पहचान पत्र बनवाते है और अपने चुनिंदा राजनीतिक पार्टी के वोट बढ़ाने के लिए वोटर बैंक तैयार रखते हैं।
इस तरह के भ्रष्टाचार हमारे देश में बहुत ही सरलता से बढ़ रही है। मजे की बात है कि जिनकी पहचान शक के घेरे में है उनका भारतीय पहचान पत्र जल्द बन जाता है। वहीं आम नगरिकों को अपने ही देश में पहचान पत्र बनाने के लिए काफी जद्दोजहद करना पड़ता है। लोकतंत्र में समाज के नीचले स्तर पर हो रहे इस तरह के कृत के कारण पूरा देश आज गंभीर संकट से गुजरने पर आमदा है।
देश के राजनीतिक पार्टियों के इस तरह के हरकत से झगड़ालू पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ-साथ अब बंग्लादेश के नागरिकों का भारत में पहचान पत्र आसानी से बनने का संगीन मामला सामने आ चुकी है। एक सूचना के मुताबिक बंग्लादेश के नागरिकों का बंगाल और बिहार में ऐसा नेटवर्क है कि उनके भारत के सीमा में प्रेवश से पहले ही उनकी पहचान पत्र बन कर तैयार रहता है।
नतीजतन सैकड़ों विदेशी इंटेलीजेंस के लोग हमारे देश में आजादी के बाद से ही गढ़ बनाए हुए हैं। जिनकी घिनौनी हरकत की झलक आय दिन नज़र आती है। इसलिए आतंकवादी विरोधी तैयारी के अंतर्गत देश के प्रत्येक नागरिकों का फोटो पहचान पत्र अति आवश्यक है। लेकिन पहचान पत्र बनाने की प्रक्रिया में व्याप्त भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने के बाद ही आतंकवादियों के नेटवर्क को पता लगाने में सफलता मिलेगी।
तब, जाहिर है कि देश का हर जाकिर अपने सपने को साकार करेगा और फोटो पहचान पत्र लेकर अपने खूबसूरत देश को हर तरफ से देखकर गर्व से कहेगा मैं भारत का नागरिक हूं।
जाकिर और जाकिर जैसे देश के कई लोगों के पास किसी तरह का पहचान पत्र न रहना इत्तिफाक ही होता है। क्योंकि जब उसके इलाके में पहचान पत्र बनाई जाती है तब वह दूसरे नगरों में रोजगार कर रहा होता है। अगर अपने इलाके में रहता भी है तो उसके नाम पहचान पत्र बनाने वाले के सूची में नहीं होता है।
इस तरह सैंकड़ों जाकिर इस जमीन पर अस्तित्व में आने के बावजूद अपनी पहचान पत्र न होने या बनने के इंतजार में इस बड़ी सी खूबसूरत दुनिया के छोटे से कोने में खुद को सिकोड़ कर बैठा रहता है।
दूसरी तरफ अनगिनत ऐसे दहशतगढ़ हैं जो भारतीय पहचान पत्र बनाकर हमारे देश के कई इलाकों में आतंक का ताण्डव कर रहा है। इसी का नजारा है हाल में दिल्ली में पकड़ा गया पाकिस्तानी नागरिक आफताब उर्फ अलीखान। जो दिल्ली विधान सभा चुनाव में सीमापुरी क्षेत्र में कांग्रेसी उम्मीदवार के लिए पोलिंग एजेण्ट के तौर पर काम कर रहा था। गौरतलब है कि वह पिछले तीन साल से हमारे देश में रह रहा है और दिल्ली चुनाव में मतदान भी किया है। उसके पास से दिल्ली राज्य के कांग्रेस विधायक वीर सिंह धिंगान का कार्यकर्ता पहचान पत्र, देहरादून का ड्राईविंग लाईसेंस, स्वयं सहायता समूह का परिचय पत्र, पाकिस्तानी पासपोर्ट का फोटो कॉपी पाई गई। साथ ही दिल्ली के वोटर लिस्ट में अफताब का नाम भी है।
अब सवाल यह रह जाता है कि इन सबका जिम्मेदार कौन है? कहां हुई है चूक?
इसके जवाब के लिए हम जनता और सरकार को ईमानदारी से अपने अंदर झांकने का समय सामने आ गया है।
चूंकि आतंकवाद पर देश के मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में राजस्थान के मुख्यमंत्री ने आतंकवाद से निपटने के लिए पूरे देश में फोटो पहचान पत्र बनाने की बात कही है। इसलिए फोटो पहचान पत्र बनाने की प्रक्रिया पर भी नज़र डालना होगा। जिसे बिल्कुल पाक-साफ नहीं कहा जा सकता। फोटो पहचान पत्र बनाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट ब्लॉक के अधिकारियों को मतदाता सूची बनाने का निर्देश जारी करता है जिसे ब्लॉक के अधिकारी ग्राम पंचायत या सरकारी विद्यालय के शिक्षकों को गांव-मुहल्लों में जाकर नागरिकों की सूची तैयार करने के लिए कहता है। लेकिन पंचायत और शिक्षक घर-घर न जाकर वे क्षेत्र के राजनीतिक कार्यकर्ता या दबंग लोगों से मशविरा कर मतदाता सूची तैयार कर लेता है। ये राजनैतिक कार्यकर्ता अपने पार्टी के ज्यादा से ज्यादा सदस्य और वोटर बनाने के लोभ में पसंद के लोग और रिश्तेदारों को एक से अधिक बार नाम बदल कर सूची तैयार करवाता है। फोटो खिंचवाते समय आसपास के पहचान के लोगों का बारी-बारी से सूची में नामानुसार फोटो बनवाया जाता है। कई इलाकों में जाति और धर्म विशेष के लोग निम्न वर्ग के लोगों को दबाकर उनके नाम पर अपने लोगों का पहचान पत्र बनवाते है और अपने चुनिंदा राजनीतिक पार्टी के वोट बढ़ाने के लिए वोटर बैंक तैयार रखते हैं।
इस तरह के भ्रष्टाचार हमारे देश में बहुत ही सरलता से बढ़ रही है। मजे की बात है कि जिनकी पहचान शक के घेरे में है उनका भारतीय पहचान पत्र जल्द बन जाता है। वहीं आम नगरिकों को अपने ही देश में पहचान पत्र बनाने के लिए काफी जद्दोजहद करना पड़ता है। लोकतंत्र में समाज के नीचले स्तर पर हो रहे इस तरह के कृत के कारण पूरा देश आज गंभीर संकट से गुजरने पर आमदा है।
देश के राजनीतिक पार्टियों के इस तरह के हरकत से झगड़ालू पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ-साथ अब बंग्लादेश के नागरिकों का भारत में पहचान पत्र आसानी से बनने का संगीन मामला सामने आ चुकी है। एक सूचना के मुताबिक बंग्लादेश के नागरिकों का बंगाल और बिहार में ऐसा नेटवर्क है कि उनके भारत के सीमा में प्रेवश से पहले ही उनकी पहचान पत्र बन कर तैयार रहता है।
नतीजतन सैकड़ों विदेशी इंटेलीजेंस के लोग हमारे देश में आजादी के बाद से ही गढ़ बनाए हुए हैं। जिनकी घिनौनी हरकत की झलक आय दिन नज़र आती है। इसलिए आतंकवादी विरोधी तैयारी के अंतर्गत देश के प्रत्येक नागरिकों का फोटो पहचान पत्र अति आवश्यक है। लेकिन पहचान पत्र बनाने की प्रक्रिया में व्याप्त भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने के बाद ही आतंकवादियों के नेटवर्क को पता लगाने में सफलता मिलेगी।
तब, जाहिर है कि देश का हर जाकिर अपने सपने को साकार करेगा और फोटो पहचान पत्र लेकर अपने खूबसूरत देश को हर तरफ से देखकर गर्व से कहेगा मैं भारत का नागरिक हूं।
Thursday, 11 December 2008
जियो मेरे देश के जवान...
मुम्बई हमले में शहीद हुए कांस्टेबल तुकाराम कांबले और एनएसजी उन्नयन कृष्णन की शहादत की गर्मजोशी से चर्चा 11 दिसंबर, 2008 को संसद के मानसून सत्र के दूसरे दिन गृहमंत्री चिदंबरम ने की। उनका कहना था कि तुकाराम कांबले की ही असीम वीरता के कारण इन हमलों में शामिल एकमात्र आतंकवादी कसाब को पकड़ा जा सका। कांबले ने कसाब के मशीनगन को तबतक पकड़े रखा और अपनी छाती में बुलेट खाता रहा जबतक कि उसको अन्य पुलिसकर्मी ने पकड़ नहीं लिया। कमांडो के मेजर उन्नयन कृष्णन नरीमन हाउस ऑपरेशन के दौरान मारे गए थे।
इसी दौरान विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि मुंबई मिशन पूरा कर लौट रहे एनएसजी के कमांडो से एक टीवी संवाददाता के सवाल पर जवाब था कि हम ऐसे छोटे-मोटे हमलों के लिए हर समय तैयार रहते हैं। हमें तनिक भी भय नहीं होता है। इसी तरह की हिम्मत भारत के सिर्फ एक जवान में नहीं हम हर भारतीय में होना चाहिए। इसके बाद ही देश के इस तरह के दुश्मनों का नेस्तनाबूत कर सकते हैं।
साथ ही उस टीवी चैनल (शायद आजतक) को भी शाबाशी दी जिसने ताज महल होटल के साथ-साथ रेलवे स्टेशन पर मरे उन मासूम और आम जनता का कवरेज दिखाया था कि कैसे बेचारे तरप-तरप कर दम तोड़ रह थे। कुछ ऐसे लोग थे जो पहली बार मुंबई दर्शन के लिए आए थे और अपनी प्यारी मायानगरी में बम के धमाकों में विलिन हो गए... फिर कभी वो कुछ और देखने के लायक नहीं रहें।
सदन में आडवाणी ने स्पष्ट किया कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा का गहराई से विश्लेषण करने का मौका है। आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई में सरकार और पूरा विपक्ष को एक जुट होकर निर्णायक रणनीति बनाना होगा। सरकार को पाकिस्तान द्वारा वहां आतंकवादियों के खिलाफ दिखावा मात्र की जा रही कार्रवाई से संतुष्ठ होकर नहीं बैठ जाना चाहिए। लश्कर-ए-तैयबा सऊदी अरब से मिलने वाले धने से पोषित और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा संरक्षित संगठन है, इसलिए उसके खिलाफ पाकिस्तान में कार्रवाई करना इतना आसान नहीं है।
तत्कालिक परिस्थिति के मद्देनज़र इस मसले पर संयुक्त राष्ट्र के सहयोग पर अधिक विश्वास न कर हमें अपनी कूटनीति क्षमता पर अधिक विश्वास करना चाहिए। क्योंकि यूएन का कश्मीर के मामले में अपनाया गया रवैया सबको पता है।
इस दर्दनाक मंजर को आतंकवादी घटना भर नहीं बल्कि अपने मातृभूमि पर हमला समझना होगा। इन घटनाओं के लिए पाकिस्तान को सबक सिखाने और हमारे देश के अंदर हमलों में उसकी संलिप्तता विश्व को बताने में हम भारतीय को हिचकिचाना नहीं चाहिए।
इसी दौरान विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि मुंबई मिशन पूरा कर लौट रहे एनएसजी के कमांडो से एक टीवी संवाददाता के सवाल पर जवाब था कि हम ऐसे छोटे-मोटे हमलों के लिए हर समय तैयार रहते हैं। हमें तनिक भी भय नहीं होता है। इसी तरह की हिम्मत भारत के सिर्फ एक जवान में नहीं हम हर भारतीय में होना चाहिए। इसके बाद ही देश के इस तरह के दुश्मनों का नेस्तनाबूत कर सकते हैं।
साथ ही उस टीवी चैनल (शायद आजतक) को भी शाबाशी दी जिसने ताज महल होटल के साथ-साथ रेलवे स्टेशन पर मरे उन मासूम और आम जनता का कवरेज दिखाया था कि कैसे बेचारे तरप-तरप कर दम तोड़ रह थे। कुछ ऐसे लोग थे जो पहली बार मुंबई दर्शन के लिए आए थे और अपनी प्यारी मायानगरी में बम के धमाकों में विलिन हो गए... फिर कभी वो कुछ और देखने के लायक नहीं रहें।
सदन में आडवाणी ने स्पष्ट किया कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा का गहराई से विश्लेषण करने का मौका है। आतंकवाद के खिलाफ इस लड़ाई में सरकार और पूरा विपक्ष को एक जुट होकर निर्णायक रणनीति बनाना होगा। सरकार को पाकिस्तान द्वारा वहां आतंकवादियों के खिलाफ दिखावा मात्र की जा रही कार्रवाई से संतुष्ठ होकर नहीं बैठ जाना चाहिए। लश्कर-ए-तैयबा सऊदी अरब से मिलने वाले धने से पोषित और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा संरक्षित संगठन है, इसलिए उसके खिलाफ पाकिस्तान में कार्रवाई करना इतना आसान नहीं है।
तत्कालिक परिस्थिति के मद्देनज़र इस मसले पर संयुक्त राष्ट्र के सहयोग पर अधिक विश्वास न कर हमें अपनी कूटनीति क्षमता पर अधिक विश्वास करना चाहिए। क्योंकि यूएन का कश्मीर के मामले में अपनाया गया रवैया सबको पता है।
इस दर्दनाक मंजर को आतंकवादी घटना भर नहीं बल्कि अपने मातृभूमि पर हमला समझना होगा। इन घटनाओं के लिए पाकिस्तान को सबक सिखाने और हमारे देश के अंदर हमलों में उसकी संलिप्तता विश्व को बताने में हम भारतीय को हिचकिचाना नहीं चाहिए।
लश्कर-ए-तैयबा पर है नज़र
इन दिनों मुंबई धमाकों के लिए एक शक की सूई पाकिस्तान परस्त लश्कर-ए-तैयबा और इससे जुड़े भारत में सक्रीय सिमी पर है। हमारी नज़र है इसके नेटवर्क पर।
लश्कर-ए-तैयबा का नींव 1990 में अफगानिस्तान के कुनार सूबे रखा गया। यह पाकिस्तानी अहले हदीस के मरकज-उल-दवा-वल इरशाद यानी एमडीआई का फौजी दस्ता कहा गया। एमडीआई के प्रमुख प्रो. हफीज मोहम्मद सईद ही लश्कर-ए-तैयबा के अमीर है। 1993 में जम्मू-कश्मीर में पहली बार इसकी मौजूदगी रही। साथ ही पुंछ में इस्लामी इंकलाबी महाज के साथ गतिविधियां देखी गई।
इस संगठन का सीधे तौर पर मकसद है:
जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करना। पूरे भारत में इस्लामी राज्य कायम करना।
इसके ढांचे पर नज़र :
लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय लाहौर के मुरीदके में एमडीआई परिसर है। एक सूचना के मुताबिक फिलहाल पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर के मुजफ्फराबाद में मुख्यालय है। मौलाना अब्दुल वहीद कश्मीरी प्रांत क प्रमुख है। इसके सुप्रीम कमांडर जकी उर रहमान नकवी भी जम्मू कश्मीर में ही है। इसका काम मुख्यतौर से जिला स्तर पर होता है। इस काम में इसके जिला कमांडरों के द्वारा मदद की जाती है। सबूत तो यह भी है कि इस संगठन के अलग-अलग प्रशिक्षण शिविर और शाखाएं पाकिस्तान में ही है। इसमें भर्ती और पैसा जूटाने का काम भी इसी क्षेत्र से होता है।
इसके ऑपरेशन पर एक नज़र:
पहले कश्मीर के घाटी में खासा सक्रीय रहे, फिर जम्मू और धीरे-धीरे देश के अंदर के नकसलवादियों और उग्रवादियों के संपर्क गांठ लिया। अब पूरा देश में मुस्लिम बहुल इलाकों में निवास कर रहे हैं। खासतौर से छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में रहना पसंद करते हैं।
अभी तक इसके निशाने पर विशेषतौर पर सुरक्षा बल होते हैं। ये गैर मुस्लिम आबादी का नरसंहार करना खासा पसंद करते हैं। ये सुरक्षा बल के वर्दी में करते हैं फियादीन हमले और खून-खराबा। गिरफ्तरी नहीं मुठभेड़ में मरना है इन्हें पसंद। भारत के अंदर हिज्ब, जैश और सिमी बड़े ऑपरेशन में मददगार होते हैं। इनको इशारा करने वाला और कोई नहीं पाकिस्तान का खुफिया एजेंसी आईएसआई है। इसी के इशारे पर सारा आतंकवादी कार्रवाई भारत के अंदर होते रहा है। यह सिलसिला आजादी के बाद ही शुरू हुआ था। जो अब भारत के द्वारा ठोस कार्रवाई के बाद ही शायद खत्म हो सकता है। इस संगठन का नेटवर्क दुनियाभर के आतंकवादी संगठन और अल-कायदा से भी बताया गया है।
लश्कर के बड़े हमले पर एक नज़र:
लश्कर-ए-तैयबा का नींव 1990 में अफगानिस्तान के कुनार सूबे रखा गया। यह पाकिस्तानी अहले हदीस के मरकज-उल-दवा-वल इरशाद यानी एमडीआई का फौजी दस्ता कहा गया। एमडीआई के प्रमुख प्रो. हफीज मोहम्मद सईद ही लश्कर-ए-तैयबा के अमीर है। 1993 में जम्मू-कश्मीर में पहली बार इसकी मौजूदगी रही। साथ ही पुंछ में इस्लामी इंकलाबी महाज के साथ गतिविधियां देखी गई।
इस संगठन का सीधे तौर पर मकसद है:
जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करना। पूरे भारत में इस्लामी राज्य कायम करना।
इसके ढांचे पर नज़र :
लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय लाहौर के मुरीदके में एमडीआई परिसर है। एक सूचना के मुताबिक फिलहाल पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर के मुजफ्फराबाद में मुख्यालय है। मौलाना अब्दुल वहीद कश्मीरी प्रांत क प्रमुख है। इसके सुप्रीम कमांडर जकी उर रहमान नकवी भी जम्मू कश्मीर में ही है। इसका काम मुख्यतौर से जिला स्तर पर होता है। इस काम में इसके जिला कमांडरों के द्वारा मदद की जाती है। सबूत तो यह भी है कि इस संगठन के अलग-अलग प्रशिक्षण शिविर और शाखाएं पाकिस्तान में ही है। इसमें भर्ती और पैसा जूटाने का काम भी इसी क्षेत्र से होता है।
इसके ऑपरेशन पर एक नज़र:
पहले कश्मीर के घाटी में खासा सक्रीय रहे, फिर जम्मू और धीरे-धीरे देश के अंदर के नकसलवादियों और उग्रवादियों के संपर्क गांठ लिया। अब पूरा देश में मुस्लिम बहुल इलाकों में निवास कर रहे हैं। खासतौर से छोटे-छोटे कस्बों और गांवों में रहना पसंद करते हैं।
अभी तक इसके निशाने पर विशेषतौर पर सुरक्षा बल होते हैं। ये गैर मुस्लिम आबादी का नरसंहार करना खासा पसंद करते हैं। ये सुरक्षा बल के वर्दी में करते हैं फियादीन हमले और खून-खराबा। गिरफ्तरी नहीं मुठभेड़ में मरना है इन्हें पसंद। भारत के अंदर हिज्ब, जैश और सिमी बड़े ऑपरेशन में मददगार होते हैं। इनको इशारा करने वाला और कोई नहीं पाकिस्तान का खुफिया एजेंसी आईएसआई है। इसी के इशारे पर सारा आतंकवादी कार्रवाई भारत के अंदर होते रहा है। यह सिलसिला आजादी के बाद ही शुरू हुआ था। जो अब भारत के द्वारा ठोस कार्रवाई के बाद ही शायद खत्म हो सकता है। इस संगठन का नेटवर्क दुनियाभर के आतंकवादी संगठन और अल-कायदा से भी बताया गया है।
लश्कर के बड़े हमले पर एक नज़र:
- 22 मार्च, 1997 संग्रामपुरा के कश्मीरी पंडित- 7 मरे
- जनवरी 1998 वनधामा के कश्मीरी पंडित-24 मरे
- 22 दिसंबर, 2000 लाल किला तीन मरे(जिनमें एक आतंकी था)
- 1 अक्टूबर, 2001 श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर विधानसभा-27 मरे
- 13 दिसंबर, 2001 संसद पर हमला 12 मरे (जिनमें पांच आतंकी थे)
- 21 मई, 2002 हुर्रियत नेता अब्दुल गनी लोन की हत्या
- 13 जुलाई, 2003 श्रीनगर के कासिम नगर बाजार-27 मरे
- 20 जूलाई, 2005 श्रीनगर कार बम धमाका- 4 सैनिक
- 18 अक्टूबर, 2005 तब से राज्य शिक्षा मंत्री अब्दुल नबी लोन की हत्या
- 3 मई, 2006 डोडा और ऊधमपूर के हिंदू- 35 मरे
- 1 जून, 2006 नागपुर में संघ मुख्यालय पर हमले की कोशिश
अंतत: 26 अक्टूबर, 2001 को लश्कर-ए-तैयबा पर प्रितिबंध लगया गया।
दूसरी नज़र में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी)
- 25 अप्रैल, 1977 को अलीगढ़ में पड़ी बुनियाद
- संस्थापक मोहम्मद अहमदुल्लाह सिद्दीकी, प्रोफेसर, वेस्टर्न इलिनॉएस यूनिवर्सिटी, इलिनॉएस
- जमात-ए-इस्लामी हिंद की शाखा
मकसद
- इस्लाम के लिए जेहाद
- संविधान की आलोचना
- इस्लामी राज्य का सपना
- बुत परस्ती और गैर-मुसलमानों के खिलाफ
- संगठन के मुताबिक अल-कायदा और ओसामा बिन-लादेन मुजाहिदों की बेहतरीन मिसाल
नेतृत्व
- सफदर नागौरी के नेतृत्व में काम हो रहा है
रिश्ते
- पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल की जमात-ए-इस्लामी
- हिज्बुल मुजाहिदीन
- आईएसआई
- जैश-ए-मोहम्मद
- लश्कर-ए-तैयबा
आधार
- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, बिहार और प. बंगाल
सदस्य
- 400 कैडर
- 20,000 साधारण सदस्य
- 30 साल तक की उम्र के छात्र बन सकते हैं सदस्य
हमले
सीधे तौर से हमला नहीं, दूसरे संगठनों को दी जाती है मदद।
प्रतिबंध
27 सितंबर, 2001
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